अखण्ड राष्ट्र के पुरोधा श्याम प्रसाद मुखर्जी: एक ऐतिहासिक दृष्टि

  • पंकज कुमार शुक्ल शोध छात्र, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर
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Abstract

सिंह का कभी राज्याभिषेक नहीं होता तभी तो अपने पराक्रम से वह स्वतः ही ‘‘मृगेंद्र’’ पद को प्राप्त करता है। यह युक्ति वन के प्राणियों के लिए ही नहीं मानव के व्यवहार में भी चरितार्थ होती हैं। भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष और भारतीय लोकसभा में विरोधी पक्ष के प्रमुख नेता डाॅ0 श्यामा प्रसाद मुखर्जी अपनी विद्वता और वाकपटुता एवं महान व्यक्तित्व के कारण लोकप्रिय हैं। संसार में ऐसे कम लोग हैं जिन्होंने जीवन के केवल 52 साल के अंतिम 14 साल राजनीति में बिताए हों और इसी अल्पावधि में यह महानतम ऊंचाई को छूकर इतिहास में अमर हो गए हो। डाॅ0 श्यामा प्रसाद मुखर्जी इनमें से एक थे। उनका जन्म 8 जुर्ला 1901 केा कलकत्ता में हुआ था। ‘‘बांग्लार बाघ’’ अर्थात् बंगाल टाइगर के नाम सुविख्यात महान शिक्षाविद सर आशुतोष मुखर्जी (1864-1924) के दूसरे पुत्र डाॅ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भी अपने जीवन का प्रारम्भ एक शिक्षाविद तथा एक वकील के रूप में किया था। कलकत्ता विश्वविद्यालय में शानदार शैक्षणिक रिकार्ड तथा स्नातक एवं स्नातकोत्तर परीक्षा में सर्वोच्च स्थान पाकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कोलकाता उच्च न्यायालय में ‘‘इंडियन बार’’ के सदस्य बनने के लिए कानून का अध्ययन किया और इसके बाद बैरिस्टर बनने के लिए इंग्लैण्ड रवाना हो गए जिससे कि वह ‘‘इंग्लिश बार’’ में सदस्य बन सकें। लेकिन उनके इंग्लैण्ड जाने का मूल उद्देश्य ब्रिटेन मे विश्वविद्यालयों की कार्य प्रणाली का अध्ययन करना था। उन्होंने यही किया और कलकत्ता विश्वविद्यालय की सिंडिकेट में केवल 23 साल की उम्र में सबसे युवा सदस्य थे। सिर्फ 33 साल की उम्र में वह विश्वविद्यालय के उप कुलपति बन गए और विश्वविद्यालय के संचालन में नए प्राण डाल दिए। इस पद पर रहते हुए भारतीय दृष्टिकोण से भारतीय इतिहास में गम्भीर शोध करने के इच्छुक राष्ट्रवादी विद्वानों को उन्होंने भरपूर सहयोग व समर्थन दिया।

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Published
2024-11-22
How to Cite
शुक्लप. क. (2024). अखण्ड राष्ट्र के पुरोधा श्याम प्रसाद मुखर्जी: एक ऐतिहासिक दृष्टि. Humanities and Development, 19(03), 13-15. https://doi.org/10.61410/had.v19i3.197