शिवानी-साहित्य: अभिव्यक्ति-शक्ति
Abstract
शिवानी उन लेखिकाओं में हैं जिन्होंने साहित्य में जनमानस की रूचि बढ़ायी। उन्होंने साहित्य और लोकप्रिय साहित्य के बीच की दीवार को तोड़ने में बड़ा योगदान दिया और उसे शिखर पर पहुँचाया, क्योंकि साहित्य जनमानस तक नहीं पहुँचेगा तो साहित्य नहीं कहलाएगा। उन्होंने गम्भीर साहित्य पढ़ने वाला पाठक-वर्ग तैयार किया। इससे बाकी हिन्दी साहित्य भी पढ़ा गया और लोकप्रिय हुआ। इस कार्य में उनकी भाषा बहुत सहायक हुई। लेकिन इस कार्य में न उन्होंने अपने स्तर को छोड़ा, न भाषा को। निश्चित तौर पर हिन्दी साहित्य को उन्होंने भाषा-संस्कार दिया। उनके लेखन की विशिष्टता कसी हुई ऐसी कथात्मकता है जो पाठकों को बाँध कर आगे बढ़ती है। शिवानी ने अपनी भाषा के साथ कभी समझौता नहीं किया और लोकप्रिय होने के लिए उन्होंने अपनी भाषा या कथ्य को सस्ता नहीं बताया। ‘‘शरतृ बाबू हो या रवीन्द्रनाथ ठाकुर दोनों की भाषा में अपार मार्दव, सौष्ठव और लालित्य है, कला-भंगिमाएँ हैं तो साहित्यिक गरिमा और आभिजात्य भी है। इसके बावजूद अगर वे महान हैं तो उसके पीछे उनकी महती और अतुलनीय लोकप्रियता है। लोकप्रिय होने के लिए उन्होंने अपनी भाषा का कथ्य को सस्ता नहीं बनाया। शिवानी के आदर्श इस मामले में कहीं-न-कहीं शरत् बाबू और रवीन्द्रनाथ ठाकुर ही थे। शायद शिवानी को खुद पर और अपने लेखन पर इस मामले में पूरा विश्वास था कि अगर उनके कथा-कथन में ताकत और मार्मिकता होगी, अगर उनके हृदय में पात्रों का सच्चा दुःख बसा होगा, तो जो भाषा वे लिखती हैं उसी में वह दुःख कह उठेगा और पाठकों के दिलों पर पहुंचेगा।‘
