महात्मा गांधी के दृृष्टिकोंण में व्यावसायिक शिक्षा
Abstract
वर्तमान शोध का मूल उद्देश्य है कि महात्मा गांधी के दृृष्टिकोण में व्यावसायिक शिक्षा को जाना जाए। वर्तमान शोध आलेख द्वितीयक स्रोत पर आधाारित है। वर्तमान अध्ययन के परिणाम इंगित करते हैं कि गांधी जी स्वावलंबन की शिक्षा देना चाहते थे। उनके दृष्टिकोण में ग्रामीणों कीे शिक्षा में कृषि, कताई, बढईगिरी, कुटीर शिल्प, हस्तशिल्प, हथकरघा, चरखा चलाना, आदि समावेश हो। वे ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों में औद्योगिक शिक्षा के पक्षधर थे। महात्मा गांधी शरीर में उत्पन्न होने वाली गति को सर्वोपरि मानते थे। गांधी जी चाहते थे कि गांव के अनुसार उपयोग में आने वाले गणित, भूगोल, ग्राम इतिहास, आदि पाठ्य क्रम में हो। गांधी जी शिक्षकों द्वारा दिए जा रहे अनाप-शनाप एवं अनचाही शिक्षा के खिलाफ थे जो कि आगे चलकर बच्चों को निरीहमशीन बना दे। गांधी जी का कहना था कि बच्चों की शिक्षा शारीरिक काम पर आधारित हो और यह कार्य शिक्षक के देख-रेख में हो। गांधी जी लड़़के-लड़कियों को पढाई के दौरान ही सीने-पिरोने और रसोई का काम सीखने व बाप-दादा के काम धंधा का काम सीखने व अर्थोपार्जन के लिए कहते थे। गांधी जी चाहते थे कि डिग्री मिलने के बाद किसी को भी आगे अतिरिक्त ज्ञान व प्रशिक्षण हासिल नहीं लेना पड़े। बल्कि अपनी प्राप्त शिक्षा के समय प्राप्त ज्ञान व प्रशिक्षण से गुजारा कर ले और भविष्य में ये ज्ञान कभी भी अनुपयोगी साबित नहीं हो।
