महर्षि वाल्मीकि का आर्थिक चिन्तन

  • रामलाल वि‛वकर्मा सहायक आचार्य, संस्कृत-विभाग, का0सु0 साकेत पी0जी0काॅलेज, अयोध्या

Abstract

पा‛चात्य आर्थिक वि‛ोषज्ञों के अभिमत से भारत में कोई व्यवस्थित अर्थ‛ाास्त्रीय चिन्तन परम्परा नहीं रही है। सम्भवतः ये पा‛चात्य विद्वान् प्राचीन भारतीय साहित्य (वैदिक साहित्य) से अनभिज्ञ थे। जिसमें आर्य बहुत पहले से ही एक नियमित सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत संगठित होकर अपनी जीवन-चर्या को स्थायी रूप दे चुके थे तथा उनका आर्थिक जीवन अत्यधिक स्थिर एवं उन्नत बन गया था। उनकी जीविका का प्रमुख साधन खेती तथा प‛ाु पालन था। आर्य कृषि को अत्यधिक महत्त्व देते थे। पा‛चात्य आर्थिक चिन्तन तो केवल अर्थ और काम तक ही सीमित थे, किन्तु भारतीय ज्ञान परम्परा मे इसे अपूर्ण एवं संकुचित मानते हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के रूप में चार पुरुषार्थों की सहायता से अर्थ‛ाास्त्र को अत्यधिक व्यापक और सन्तुलित आधार प्रदान किया है।

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Published
2024-12-30
How to Cite
वि‛वकर्मार. (2024). महर्षि वाल्मीकि का आर्थिक चिन्तन. Humanities and Development, 19(04), 24-31. Retrieved from https://humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/235