तन्त्र-साधना अगस्त्य के शक्तिसूत्र के अनुसार में ‘शक्तितत्त्व’
Abstract
शोध सारांश भारतीय संस्‟ति और साधना के गूढ़तम तत्त्वों का अनुसन्धान करने वाले महातन्त्रयोगियों की २ढ़ धारणा थी कि भारतीय साधना विश्व की प्राचीनतम संस्‟ति या विश्व मानव की साधना है। तन्त्रयोगियों ने गुह्यतम एवं लुप्त प्रायः तन्त्रज्ञान को हमारे समक्ष हस्तामलकवत् रखा है। यतोहि तन्त्र-उपासना प्रधान शास्त्र है और आदि शिव तथा आदि पार्वती उपास्य देवता है। तन्त्रयोगियों के पास अनुभवसिद्ध ज्ञान का अक्षय भण्डार था जिसे उन्होंने अपने समग्र जीवन में स्वाध्याय एवं साधना द्वारा अभिसिञ्चित किया था। तन्त्र-साधना से सम्बन्धित साहित्य पर विहङ्गालोकन किया जाए तब वह एक महार्णव की भांति ही २ष्टिगोचर होता है। अत एव प्रस्तुत शोध-पत्र तन्त्र -साधना में अगस्त्य के शक्तिसूत्र के अनुसार ‘शक्तितत्त्व’ श्रीसाधना के सन्दर्भ में प्रस्तुत विचारों को आगम परम्परा के मूल ग्रन्थों के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया गया है। वैदिक विद्या में श्रीविद्या सर्वाेच्च विद्या है इसी का अपररूप गायत्री मन्त्र में स्फुरित हुआ है। देव्युपनिषद् एवम् अथर्ववेद सौभाग्य खण्ड में इस विद्या को रहस्यात्मक आवरण या प्रतीक शब्दावली में कहा गया है-
