देवगढ़ का दशावतार मन्दिर
Abstract
प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला की धरोहर में गुप्त साम्राज्य एक महत्वपूर्ण काल का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे ‘स्वर्ण युग’ के नाम से भी जाना जाता है। प्रारम्भ में मन्दिरों का निर्माण काष्ठ जैसी नाशवान सामग्री से होता था, परन्तु गुप्तकाल में मन्दिरों का निर्माण पाषाण से किया जाने लगा, इसलिए यदि कहा जाय कि मंन्दिर निर्माण कला का वास्तविक जन्म गुप्तकाल में हुआ, तो अतिश्योक्ति नहीं होगा। ‘मन्दिर’ शब्द संस्कृत भाषा के इतिहास में अधिक प्राचीन नहीं है। सर्वप्रथम इसका उल्लेख ‘‘शतपथ ब्राह्मण’’ में मिलता है। धार्मिक ग्रन्थों जैसे-महाकाव्य, सूत्रग्रन्थों में मन्दिर की अपेक्षा देवस्थान, देवगृह, देवकुल, देवायतन आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो देवता के निवास स्थान का बोध कराते हैं। इस काल में अनेक मन्दिरों का निर्माण विभिन्न शैलियों में हुआ। यदि कला के क्षेत्र का सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाय, तो यह परिलक्षित होता है कि, हड़प्पा सभ्यता से लेकर मौर्योत्तर काल तक गुप्तकालीन नवप्रवर्तन की आधारशिला निर्मित की गयी। मौर्य काल में वास्तुकला के क्षेत्र में जहाँ अनेक ‘स्मारकीय पत्थर’ बनाये गये, वहीं शंुग और कुषाणों ने ‘गान्धार कला का विस्तार करते हुए अनेक बौद्ध स्तूपों का निर्माण कराया। गुप्त काल में मन्दिर निर्माण की नयी तकनीक ने एक विशिष्ट वास्तुकला का विकास किया, जिसमें गर्भगृह, मंडप और विशाल शिखरों वाले मन्दिरों का निर्माण किया गया। गुप्त काल में ‘नागर’ तथा ‘पंचायतन’ वास्तुकला में मथुरा कला शैली की पारदर्शिता को देखा जा सकता है। गुप्त साम्राज्य कला के साथ-साथ साहित्य के विकास में अमूल्य योगदान देकर, आने वाले युग के लिए अपनी विरासत को प्रतीकात्मक रूप से स्थापित किया।
