प्राचीन भारत की जैन गुफाए
Abstract
जैन धर्म एक निरन्तर प्रवर्धमान धार्मिक मत है। समय के साथ इसका स्वरूप, मान्यताएं, धार्मिक वि‛वास और कर्मकाण्ड अपने में नवीन तत्वों को समाहित करते रहे हैं जिसका प्रमाण कला में स्पष्ट दृृष्टिगोचर होता है। प्रारम्भ में जैन सम्प्रदाय में देवता और उनकी पूजा का चिंतन अन्य संप्रदायों से थोड़ा भिन्न था। जैन ई‛वर का तात्पर्य एक मुक्त आत्मा मानते थे। उनके यहां तीर्थंकर जिन्होंने धर्म की दे‛ानाएं दीं और संघ की स्थापना की एक पूर्ण मुक्त आत्मा या सिद्ध माने गए। वे इस संसार रूपी सागर को पार करने का रास्ता बताने वाले पथ प्रदर्‛ाक थे। उनका अनुकरण कर प्रत्येक अनुयायी स्वयं का उत्कर्ष करता था। जैन संप्रदाय में कोई प्रार्थना या स्तुति से किसी ई‛वर को प्रसन्न करके उससे वर प्राप्त कर न तो भौतिक लाभ की इच्छा करता था न ही स्वर्ग या मोक्ष की कामना। वह अपने तीर्थंकरों से ‛िाक्षा ग्रहण कर, उनके बताए मार्ग पर चल कर स्वयं उनकी ही भांति मुक्त होने का प्रयास करता था। इसलिए जैन संप्रदाय में पूजा का विधान तो था किन्तु उसकी प्रकृृति अन्य संप्रदायों की भक्ति और पूजा परम्परा से पूर्णतया भिन्न थी1। जैन भाव पूजा में वि‛वास करते थे न कि द्रव्य पूजा और मूर्ति पूजा में। यहां तीर्थंकर या अर्हत की पूजा देवता से भिन्न एक पूर्ण मानव के रूप में होती थी जिन्होंने लोभ, मोह, राग, द्वे‛ा इत्यादि सभी बन्धनों को तोड़ कर आसक्ति, अनासक्ति से ऊपर उठ कर एक निर्मुक्ति की अवस्था प्राप्त की थी और ॉोष को उस अवस्था को प्राप्त कराने का प्रयास करते थे। इसीलिए उनकी मूर्तियां ध्यान या कायोत्सर्ग मुद्रा में योगी के रूप में बनाई जाती थी2। महावीर स्वामी ऐतिहासिक काल के तीर्थंकर हैं किन्तु उन्होंने किसी मंदिर में जाकर किसी जिन की उपासना की हो ऐसा उल्लेख नहीं मिलता। हां उनकी स्वयं की उनके जीवनकाल में चन्दन की मूर्ति बनाए जाने का उल्लेख मिलता है जिसे जीवन्तस्वामी कहा गया है। इस प्रकार की मूर्तियां 6ठी ॉाताब्दी से मिलने भी लगती हैं3। धीरे-धीरे जैन सम्प्रदाय ने भी मंदिरों के निर्माण, उसमें जिन मूर्तियों की स्थापना, उनकी पूजा को अंगीकार किया तथा यक्ष यक्षिणियों आदि की पूजा के माध्यम से भौतिक उत्कर्ष, संतानादि की प्राप्ति की कामना प्रारम्भ हुई। प्रत्येक तीर्थंकर का अपना लांछन नि‛िचत हुआ। सबसे प्राचीन ज्ञात मूर्ति लोहानीपुर, पटना से प्राप्त है, जो मौर्य काल की मानी जाती हैैं4।
