ग्रामीण दलित महिलाओ ं की ‛िाक्षा व्यवस्था और उसमे ं परिवर्तन
Abstract
भारत मे ं ‛िाक्षा का प्रवाह एवं विकास चार रूपांे में हुआ है; प्रथम- जातीय क्रम में अर्थात उच्च
जातियों से निम्न जातियों की ओर, द्वितीय-वर्ग क्रम में अर्थात उच्च आय वर्ग से निम्न आय वर्ग की
ओर तृतीय- लैंगिक क्रम में अर्थात पुरुष वर्ग से महिला वर्ग की ओर और चतुर्थ- स्थान क्रम में अर्थात
नगरीय क्षेत्र से ग्रामीण क्षेत्र की ओर। इस दृष्टिकाण्े ा से ग्रामीण दलित महिलाओ ं में ‛िाक्षा का स्वरूप
परम्परागत रूप में अत्यन्त नकारात्मक रहा है। प्राचीन काल में उन्हें जाति, लिंग और वर्ग के आाधार
पर ‛िाक्षा से वंचित रखा गया। पित्तृसत्तात्मक व्यवस्था, निर्धनता एवं तत्समय की ॉौक्षिक आधारभूत
संरचनाओं, संसाधनो ं एवं सुविधाओ ं की कमियो ं न े ग्रामीण दलित महिलाओ ं को केवल घरेलू, कृषि तथा
अन्य अनार्थिक, अलाभकारी, श्रममूलक कार्यों से सम्बद्ध रखा। स्वतन्त्रता प‛चात् संवैधानिक, प्र‛ाासनिक
एव ं विभिन्न सामाजिक संगठनांे द्वारा एक तरफ ग्रामीण क्षत्रे मे ं ॉौक्षिक सुविधाओ ं का विकास किया गया
तो दूसरी ओर उनमें ‛िाक्षा के प्रति सकारात्मक चेतना को भी विकसित किया गया। सम्प्रति ग्रामीण
दलित महिलाओं की ॉौक्षिक चेतना में निरन्तर परिवर्तन हो रहा है और वे विभिन्न सामाजिक,
सास्ं कृतिक, आर्थिक, राजनैतिक, प्रौद्याेि गक तथा प्र‛ाासनिक क्षेत्रांे मे ं ॉौक्षिक आधार पर संलग्न हैं।
