वैदिक देवतत्त्व विमर्श
Abstract
वेदविहित देवतत्त्व वैदिक साहित्य का मूलाधार है। द्विधा विभाजित वेद में कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड का मौलिक देवतत्त्व नितान्त ही अनुसंधानात्मक तथा रहस्यमयी है। इस तत्त्व की व्याख्या व्याकरण, निरुक्त, दार्‛ानिक ग्रन्थकार, ऋक्सर्वानुक्रमणी, आचार्य कात्यायन-श्रौतसूत्र, स्वामी दयानन्द सरस्वती और वृहद्देवतादि अपनी-अपनी दृष्टि से करतेे हैं। कर्मकाण्ड (अनुष्ठान विभाग) वेद का वि‛ााल विभाग है। इसकी अपेक्षा ज्ञानकाण्ड स्वल्प है। कर्मकाण्ड के अन्तर्गत यागादि कार्य में जो द्वव्यत्याग किया जाता है वह जिसके उद्दे‛य से किया जाता है वह तत्त्व देव या देवता है- देवतोद्दे‛ोन द्रव्यत्यागो यागः।’ इसके अतिरिक्त आचार्य यास्क ने निरुक्त ग्रन्थ में कहा है कि ‘‘यस्यै देवतायैहविर्गृहीतं स्यात् तां मनसा ध्यायेत् वषट् करिष्यन्।’1 अर्थात् जिस देवता को देने के लिए हविष् ली गई हो तो उस देवता का मन से ध्यान करना चाहिए।
