भारतीय ज्ञान परंपरा के अलोक में समकालीन पाररवाररक िवघटन : समाज काया हस्तक्षेप

  • यतीन्ि िमश्र , िवभागाध्यक्ष एवं सह.अचायाए समाज काया िवभागए बुंदेलखंड िवश्विवद्यालयए झााँसी ;ई०प्र०द्ध
  • रिव कुमार समाज काया िवभागए बुंदेलखंड िवश्विवद्यालयए झााँसी ;ई०प्र०द्ध
Keywords: भारतीय ज्ञान परंपरा, पाररर्ाररक कर्घटन, संयुक्त पररर्ार, मूल्य-अधाररत जीर्न-पद्दकत, र्ैर्ाकहक कर्च्छेद, सामाकजक पूाँजी, समाज कायव हस्तक्षेप, राष्रीय कशक्षा नीकत।

Abstract

भारतीय समाज में पररवार केवल एक सामानजक-कानूनी ाऄनुबांध न होकर जीवन-दशशन, नैनतक मूल्यों और सामानजक सुरक्षा का ाअधार रहा है। प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय ज्ञान परांपरा के ाअलोक में दाशशननक, नैनतक, साांस्कृनतक और सामानजक-मनोवैज्ञाननक नसद्ाांतों के पररप्रेक्ष्य में समकालीन समाज में बढ़ते पाररवाररक नवघटन का एक व्यवनस्थत एवां वैज्ञाननक नवश्लेषण प्रस्तुत करता है। समकालीन पररदृश्य में ाअधुननकता, पनिमीकरण, तीव्र औद्योनगकीकरण, ाऄननयांनत्रत शहरीकरण, उपभोक्तावाद और नडनजटल क्ाांनत जननत व्यनक्तवादी जीवनशैली ने पारांपररक सांयुक्त पररवार की सुदृढ़ सांरचना को नशनथल कर नदया है। नजसका प्रभाव सामानजक जीवन के बदलते स्वरूप में देखा जा सकता है। जैसे - वैवानहक नवच्छेद, ाऄांताःपीढ़ीगत सांघषश तथा वृद्ों, युवाओां व बालकों में माननसक-भावनात्मक ाऄसुरक्षा जैसी गांभीर नस्थनतयाां उत्पन्न हो रहीं हैं। यह ाऄध्ययन पारांपररक वैनदक सांस्कारों, नैनतक मूल्यों, सामानजक प्रनतमानों तथा समकालीन समाजशास्त्रीय दृनिकोण से पाररवाररक ढााँचे का नवश्लेषण प्रस्तुत करता है। प्रस्तुत ाऄध्ययन में राष्ट्रीय पररवार स्वास््य सवेक्षण-5, UN-DESA, IIPS, OECD और नवश्व स्वास््य सांगठन की नवीनतम ररपोटटशस ाआत्यानद नितीयक त्यों को ाअधार बनाया गया है, नजसके ाअधार पर नवनदत होता है नक पाररवाररक नस्थरता ही व्यनक्त के सवाांगीण नवकास का मूल है। प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय ज्ञान परांपरा के ाअलोक में पाररवाररक नवघटन की प्रकृनत को दृनिगत रखते हुए एक युगानुकूल समनन्वत दृनिकोण प्रस्तुत करता है। साथ ही व्यावसानयक समाज कायश की व्यावहाररक उपादेयता तथा राष्ट्रीय नशक्षा नीनत- 2020 के ाऄनुरूप नीनतगत ढाांचे को प्रस्तुत करता है।

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Published
2026-06-30
How to Cite
िमश्रय., & कुमारर. (2026). भारतीय ज्ञान परंपरा के अलोक में समकालीन पाररवाररक िवघटन : समाज काया हस्तक्षेप. Humanities and Development, 21(02), 271-278. Retrieved from https://humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/401