अंग्रेजो की भूमि-कर व्यवस्था तथा प्र‛ाासन

  • रवीन्द्र बहादुर सिंह असिस्टेन्ट प्रोफेसर (इतिहास विभाग), का.सु.साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अयोध्या

Abstract

साम्राज्यवादी अंग्रेजों ने भारत के प्रशासन से अधिक से अधिक आर्थिक लाभ लेने का प्रयत्न किया। कंपनी के अधिकारी स्वतंत्र व्यापार में विश्वास करते थे इसलिए उन्होंने आयात तथा निर्यात कर से अधिक राजस्व प्राप्त करने की अनुमति नहीं दी तथा राजस्व का मुख्य स्रोत भूमि कर ही रहा और उसी पर मुख्य बल तथा ध्यान दिया। अंग्रेज भारत को एक बड़ी जागीर मानते थे और भारत में ऐसी भूमि कर व्यवस्था लागू करना चाहते थे जिससे अधिक से अधिक भू-राजस्व प्राप्त किया जाए। मुख्य रूप से अंग्रेजों ने भारत में तीन प्रकार की भू-धृति पद्धतियां ;स्ंदक जमदनतम ेलेजमउेद्ध अपनाई अर्थात् स्थाई (जमींदारी), महलवाड़ी तथा रैयतवाड़ी। स्थाई जमींदारी पद्धति बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा, न्ण्च्ण् के बनारस खण्ड, उत्तरी कर्नाटक में अपनाई गई तथा लगभग समस्त भारत की 19 प्रतिशत भूमि इसके अंतर्गत आई। महलवाड़ी भू-धृति पद्धति यू.पी., मध्य, प्रांत पंजाब में (कुछ परिवर्तनों के साथ) लागू की गई जिसके अंतर्गत 30ः भूमि आई। रैयतवाड़ी पद्धति बंबई तथा मद्रास के अधिकांश भागों में, असम तथा अन्य भागों में लागू की गई और इसके अंतर्गत 51ः भूमि आई। स्थायी बंदोबस्त अंग्रेजी सरकार की देन थी। तथा इसका आरम्भ लर्ड कर्नवालिस द्वारा किया गया था। इस पद्धति के अनुसार जमींदार को (जो प्रायः भूमि कर संग्रह कर्ता ही होता था) भूमि का स्वामी स्वीकार कर लिया गया। राज्य भूमि कर देने के लिए केवल जमींदार को ही उत्तरदायी समझता था, तथा उसके कर न देने पर उसकी जमीन जब्त की जा सकती थी। कम्पनी को इस व्यवस्था से लाभ के रूप में आय का एक निश्चित हिस्सा तय हो गया, जिस पर फसल नष्ट होने का कोई प्रभाव नही पड़ता था। दूसरा लाभ यह हुआ कि जमींदार के रूप में कम्पनी ऐसे वर्ग का सहयोग मिला जो लम्बे समय तक कम्पनी के प्रति निष्ठावान बना रहा। परन्तु श्षकों को काफी कष्ट झेलना पड़ा क्योंकि इस व्यवस्था में यह निश्चित नहीं था श्षकों को कितना देना था। ब्रिटिश सरकार की सोच थी कि कम्पनी की आय तो निश्चित हो गई, फलतः जमींदार प्रगतिशील होंगे, क्योंकि श्षि के विकास होने से लाभ जमींदार को ही होना था, लेकिन जमींदार प्रगतिशील नही हो सके।

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Published
2026-09-30
How to Cite
सिंहर. ब. (2026). अंग्रेजो की भूमि-कर व्यवस्था तथा प्र‛ाासन. Humanities and Development, 21(03), 126-128. Retrieved from https://humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/422