दलित महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक उन्नयन में ‛िाक्षा की भूमिका

  • सुनीता . जान्हवीपुरम, माधवपुर, नैनी, प्रयागराज,
Keywords: सामाजिक उन्नयन, असमानता, अधिकार चेतना, समानता, सहभागिता, भेदभाव, जागरूकता, न्याय, उन्मूलन, सामाजिक सुरक्षा।

Abstract

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में जो प्रस्थिति समाज के चैथे वर्णक्रम में स्थित अनुसूचित जातियों की थी, वहीं स्थिति इस दे‛ा की महिलाओं की भी रही है। स्वतंत्रता के प‛चात् परिवर्तित रूपरेखा में संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों ने प्राचीन परम्परा को तोड़कर जातिगत भेदभाव, लैगिंक समानता, गरीबी तथा ‛िाक्षा के सीमित अवसरों में आये बदलाव ने दलित महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक प्रस्थिति में ‛िाक्षा सामाजिक परिवर्तन एवं स‛ाक्तिकरण का महत्वपूर्ण माध्यम बनकर उभरी है। साथ ही दलित महिलाओं में सामाजिक जागरूकता, आत्म-सम्मान, अधिकार-बोध, निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि तथा आर्थिक आत्म-निर्भरता में ‛िाक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ‛िाक्षा दलित महिलाओं को सामाजिक भेदभाव तथा रूढ़ियों के विरूद्ध अपनी आवाज उठाने में समक्ष बनाती है। ‛िाक्षा के माध्यम से ही रोजगार एवं उद्यमिता के अवसर में भी वृद्धि होती है। इससे महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता भी बढ़ी है। ‛िाक्षित महिलाऐं परिवार में बच्चों की ‛िाक्षा स्वास्थ्य, पोषण के साथ भविष्य निर्माण की प्रक्रिया में भी है। दलित महिलाओं की ‛िाक्षा सामाजिक गति‛ाीलता एवं परिवर्तन का महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है।

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Published
2026-09-30
How to Cite
.स. (2026). दलित महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक उन्नयन में ‛िाक्षा की भूमिका. Humanities and Development, 21(03), 231-234. Retrieved from https://humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/439