सम्राट हर्षवर्धन की शासन-पद्धति: एक ऐतिहासिक एवं प्रशासनिक अध्ययन
Abstract
बाणभट्ट द्वारा रचित ग्रन्थ हर्षचरित, चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा दिए गएं विवरण, स्वयं हर्ष द्वारा रचित तीन ग्रन्थों रत्नावली, नागानन्द एवं प्रियदर्शिका में उल्लिखित अंशों, मधुबन तथा बांसखेड़ा ताम्रपत्रों से हर्ष की शासन पद्धति पर प्रकाश पड़ता है। बाणभट्ट एवं ह्वेनसांग दोनों को ही हर्ष का आश्रय प्राप्त था अतः उनके विवरणों में हर्ष की महानता के संदर्भ में पक्षपातपूर्ण उल्लेख होने की सम्भावना है। ‘हर्षचरित’ के अनुसार हर्ष लगभग पन्द्रह-सोलह वर्ष की आयु में शासक बने। उस समय उनके माता-पिता का शरीरान्त हो चुका था। बड़े भाई राज्यवर्द्धन तथा बहनोई गृहवर्मा की हत्या की जा चुकी थी। उतर भारत अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था। इस विषम परिस्थिति में अपने को संयत करते हुए उसने अपनी सैन्य शक्ति में वृद्धि की। समयोचित श्ष्टि से कामरूप के राजा भास्कर वर्मा से मित्रता की, वल्लभी के राजा ध्रुवसेन के साथ सम्बन्ध सुश्ढ़ किए विजयों द्वारा साम्राज्य सीमा का विस्तार किया। साम्राज्य को संगठित किया। अत्यधिक श्रम करते हुए प्रजा के प्रति उदारता की नीति अपनाई। धार्मिक सहिष्णुता की भावना रखने के साथ साहित्यिक एवं पुरातात्त्विक स्त्रोतों में हर्ष की उपाधियां चक्रवर्ती, देव, परमेश्वर, परमभट्टारक, परम माहेश्वर महाराजाधिराज तथा सकलोत्रापथेश्वर आदि मिलती हैं। हवेनसांग ने हर्ष की दिनचर्या का उल्लेख करते हुए लिखा है कि ‘राजा का दिन तीन भागों में विभक्त था एक भाग में वह प्रशासन देखता तथा शेष दो भागों में धार्मिक कार्यों का सम्पादन करता था वह इन कर्यों में थकता नहीं था वरन् उसे पूरा दिन भी छोटा लगता था हर्ष अपने राज्य के निरीक्षण हेतु भ्रमण करता था। भ्रमण स्थलों पर फूस के अस्थायी भवन निर्मित किए जाते थे यदि किसी नगर के निवासी नियम के विरुद्ध आचरण करते थे तो राजा उन्हें दण्ड देता था। भले लोगों को पुरस्श्त किया जाता था। चीनी यात्री के विवरण की पुष्टि बाण के हर्षचरित से होती है। बाँसखेड़ा और मधुबन के दानपत्र इसी प्रकार की यात्राओं में वर्द्धमानकोटि और कपित्थका के जयस्कन्धावारों से निर्गत किए गए थे।
