खजुराहो की विशिष्ट विष्णु प्रतिमाएँ- एक नवीन चिन्तन
Abstract
हिन्दू’ जनमानस में वैष्णव सम्प्रदाय का अपना विशिष्ट स्थान है जो आज भी किसी न किसी रूप में भारत के प्रत्येक भाग में प्रचलित है। विष्णु सबसे पहले एक साधारण देवता के रूप में वैदिक काल से ही दिखाई देते हैं। यज्ञ के साथ विष्णु की तद्रूपता के कारण उत्तर वैदिक काल में विष्णु का महत्त्व धीरे-धीरे बढ़ गया। ब्राह्मण ग्रन्थों में विष्णु की कल्पना और विष्णुयागों का और विस्तार हुआ। पुराणों में विष्णु सम्बन्धी, कल्पनाओं, कथाओं और पूजा पद्धति का अपरिमित विस्तार हुआ है। पौराणिक सन्दर्भों में विष्णु के विभिन्न अवतारों की चर्चा मिलने लगती हैं लेकिन सबमें अवतारों की संख्या को लेकर भिन्न सूची प्राप्त होती है। गुप्तकाल तक आते-आते विष्णु-मूर्तियों के अनेक रूपों का विकास देखने को मिलता है। मध्ययुग में परिकर के विकास के साथ-साथ अलंकरण तथा यांत्रिकता दिखाई पड़ने लगती है जिससे मध्यकालीन प्रतिमा-विज्ञान अधिक जटिल हो गया परिणाम स्वरूप विष्णु मूर्तियों के भी नए रूप विकसित हुए। इस काल खण्ड में स्वतन्त्र मूर्तियों को स्थान मन्दिरों के जगती, जंधा तथा वितान आदि भागों पर किया जाने लगा। अब कई नए केन्द्रों में विष्णु-मूर्तियों का व्यापक रूप से निर्माण प्रारम्भ हुआ। खजुराहो वैष्णव मूर्ति-शिल्प की दृष्टि से उत्तर भारत का सर्वाधिक महत्त्व का केन्द्र है जहाँ आज भी अनेक वैष्णव मन्दिर हैंै। इन मन्दिरों के स्थापत्य शिल्प के साथ-साथ मूर्ति शिल्प के भी अत्यन्त मनोहारी दृश्य उपस्थित हैं जिनमें से कुछ तो अत्यन्त विलक्षण होने के साथ-साथ विशिष्ट भी हैं। इनमें से कुछ प्रतिमा शास्त्रीय ग्रन्थों में वर्णित प्रतिमा निर्देशों का पालन करती है तो कुछ पौराणिक प्रसंगों का हूबहू निरूपण लगती हों कुछ ऐसी भी विष्णु की मूर्तियाँ खजुराहो के शिल्पियों द्वारा रची गई हैं जिनका कहीं किसी शास्त्रीय निर्देश से मेल नहीं बैठता लेकिन मूर्ति-शिल्प और प्रस्तुतिकरण की दृष्टि से बेजोड़ कृति है। जो खजुराहो मूर्ति शिल्प की निज विशेषता एवं वैशिष्टय है। प्रस्तुत शोध आलेख में ऐसी ही कुछ विलक्षण एवं विशिष्ट प्रतिमाओं का चयन कर उनका प्रतिमाशास्त्रीय तथा मूर्ति-शिल्प की दृष्टि से नवीन अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।
