उत्तर प्रदेश का आदिवासी समाजः मौखिक परंपरा, सामाजिक विस्थापन और समकालीन हिंदी साहित्य में अभिव्यक्ति (Tribal Society of Uttar Pradesh: Oral Tradition, Displacement, and Representation in Contemporary Hindi Literature)
Abstract
भारतीय साहित्यशास्त्र और समकालीन सामाजिक-साहित्यिक विमर्शों में ‘आदिवासी साहित्य‘ एक अत्यंत चेतनाशील, जीवंत और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण धारा के रूप में स्थापित हो चुका है। सामान्यतः उत्तर प्रदेश को गंगा-यमुना के मैदानी भाग, कृषि-आधारित सामाजिक संरचना और अवध व पूर्वांचल की पारंपरिक लोक-संस्श्ति के परिप्रेक्ष्य में ही अधिक देखा जाता है। इस अति-सामान्यीश्त श्ष्टि के कारण उत्तर प्रदेश के सीमांत अंचलों में निवास करने वाले आदिवासी समुदायों के इतिहास, लोक-साहित्य और सामाजिक यथार्थ पर अकादमिक कार्यों में अपेक्षाश्त कम ध्यान दिया गया है। यथार्थतः, राज्य का दक्षिणी-पूर्वी विंध्य-कैमूर अंचल (सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली, बांदा) तथा उत्तरी तराई क्षेत्र (लखीमपुर खीरी, पीलीभीत, बहराइच) अत्यंत समृद्ध जनजातीय धरोहर को संजोए हुए हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र में उत्तर प्रदेश की प्रमुख जनजातियों-गोंड, कोल, थारू, खरवार, चेरो, बैगा, सहरिया और भुइयां के सामाजिक-सांस्श्तिक यथार्थ, उनकी मौखिक साहित्य परंपरा, औद्योगिकीकरण से उपजे विस्थापन के संकट तथा हिंदी कथा-साहित्य में उनके चित्रांकन का एक विशद एवं आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
