रामचरितमानस के बाद का भारतः लोक-अध्यात्म और सांस्श्तिक उदय

  • वि‛वदीपक उपाध्याय हिंदी विभाग, प्रवक्ता - श्री ब्रजेंद्र जनता महाविद्यालय, विसावर, हाथरस
Keywords: रामचरितमानस, लोक-अध्यात्म, अवधी, सांस्श्तिक पुनर्जागरण, लोकतंत्रीकरण, रामलीला, समन्वयवाद, भक्ति आंदोलन, वैश्विक भारतीय डायस्पोरा।

Abstract

सोलहवीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘रामचरितमानस‘ न केवल मध्यकालीन हिंदी साहित्य की एक कालजयी श्ति है, बल्कि यह भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक, सांस्श्तिक और आध्यात्मिक परिश्श्य को पुनर्परिभाषित करने वाला एक युगांतरकारी मोड़ भी है। प्रस्तुत शोध पत्र में यह विश्लेषण किया गया है कि रामचरितमानस की रचना के पश्चात भारतीय समाज में किस प्रकार लोक-भाषा (अवधी) के माध्यम से वैदिक एवं दार्शनिक ज्ञान का समाजीकरण हुआ। यह अध्ययन रामचरितमानस के उपरांत भारत में उपजे ‘लोक-अध्यात्म‘, अध्यात्म के लोकतंत्रीकरण, सामाजिक समन्वय और सांस्श्तिक चेतना के विविध आयामों का ऐतिहासिक एवं समाजशास्त्रीय अनुशीलन प्रस्तुत करता है। इसके अतिरिक्त, औपनिवेशिक काल में गिरमिटिया मजदूरों के साथ इसके वैश्विक प्रसार और आधुनिक युग में इसकी प्रासंगिकता का विशद विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

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Published
2026-09-30
How to Cite
उपाध्यायव. (2026). रामचरितमानस के बाद का भारतः लोक-अध्यात्म और सांस्श्तिक उदय. Humanities and Development, 21(03), 338-342. Retrieved from https://humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/459