रामचरितमानस के बाद का भारतः लोक-अध्यात्म और सांस्श्तिक उदय
Abstract
सोलहवीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘रामचरितमानस‘ न केवल मध्यकालीन हिंदी साहित्य की एक कालजयी श्ति है, बल्कि यह भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक, सांस्श्तिक और आध्यात्मिक परिश्श्य को पुनर्परिभाषित करने वाला एक युगांतरकारी मोड़ भी है। प्रस्तुत शोध पत्र में यह विश्लेषण किया गया है कि रामचरितमानस की रचना के पश्चात भारतीय समाज में किस प्रकार लोक-भाषा (अवधी) के माध्यम से वैदिक एवं दार्शनिक ज्ञान का समाजीकरण हुआ। यह अध्ययन रामचरितमानस के उपरांत भारत में उपजे ‘लोक-अध्यात्म‘, अध्यात्म के लोकतंत्रीकरण, सामाजिक समन्वय और सांस्श्तिक चेतना के विविध आयामों का ऐतिहासिक एवं समाजशास्त्रीय अनुशीलन प्रस्तुत करता है। इसके अतिरिक्त, औपनिवेशिक काल में गिरमिटिया मजदूरों के साथ इसके वैश्विक प्रसार और आधुनिक युग में इसकी प्रासंगिकता का विशद विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
