मंजुल भगत के कथा-साहित्य में स्त्री जीवन और सामाजिक यथार्थ: एक अध्ययन

  • परे‛ा कुमार पाण्डेय हिन्दी विभाग, का0सु0 साकेत पी0जी0, अयोध्या।
  • रविनन्दिनी त्रिपाठी डाॅ0 राममनोहर लोहिया अवध वि‛वविद्यालय, अयोध्या।
Keywords: कथा-साहित्य, स्त्री जीवन, सामाजिक यथार्थ, नारी चेतना, मध्यवर्ग, परिवार, सामाजिक विषमता, निर्णयात्मक प्र‛न, एकरेखीय समाघान।

Abstract

हिंदी कथा-साहित्य में मंजुल भगत का रचनात्मक योगदान सामाजिक जीवन की उन परतों को अभिव्यक्त करने के कारण महत्त्वपूर्ण है, जिनमें स्त्री, परिवार, आर्थिक विषमता, सामाजिक असमानता तथा मानवीय संबंधों की जटिलताएँ दिखाई देती हैं। उनके कथा-साहित्य में स्त्री केवल पारिवारिक व्यवस्था का एक अंग बनकर उपस्थित नहीं होती, बल्कि वह सामाजिक परिस्थितियों से संघर्ष करने वाली संवेदनशील और अनुभवशील मनुष्य के रूप में सामने आती है। मंजुल भगत की कथा-श्ष्टि में स्त्री जीवन के अनेक पक्ष आर्थिक निर्भरता, पारिवारिक दायित्व, सामाजिक अपेक्षाएँ, भावनात्मक उपेक्षा, वर्गीय विषमता, श्रम, आत्मसम्मान तथा स्वतंत्र अस्तित्व की आकांक्षा परस्पर जुड़े हुए दिखाई देते हैं। उनके यहाँ स्त्री की समस्या को केवल पुरुष-स्त्री संबंधों के सीमित दायरे में नहीं समझा जा सकता है, इसके पीछे परिवार, अर्थव्यवस्था, सामाजिक संरचना और बदलती जीवन-स्थितियों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। प्रस्तुत शोध-पत्र में मंजुल भगत के कथा-साहित्य में स्त्री जीवन के विभिन्न रूपों तथा उनसे जुड़े सामाजिक यथार्थ का अध्ययन किया गया है। इसमें यह देखने का प्रयास किया गया है कि लेखिका किस प्रकार स्त्री के व्यक्तिगत अनुभवों को व्यापक सामाजिक संदर्भ से जोड़ती हैं। उनके पात्रों के माध्यम से स्त्री की पीड़ा के साथ-साथ उसकी जिजीविषा, प्रतिरोध और आत्मसम्मान की चेतना भी सामने आती है। इस श्ष्टि से मंजुल भगत का कथा-साहित्य समकालीन समाज में स्त्री की बदलती स्थिति को समझने का उपयोगी आधार प्रदान करता है।

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Published
2026-09-30
How to Cite
पाण्डेयप. क., & त्रिपाठीर. (2026). मंजुल भगत के कथा-साहित्य में स्त्री जीवन और सामाजिक यथार्थ: एक अध्ययन. Humanities and Development, 21(03), 352-358. Retrieved from https://humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/461