मौर्यकालीन तथा वर्तमान न्याय व्यवस्था का तुलनात्मक अध्ययन
Abstract
यह शोध-पत्र मौर्यकालीन तथा वर्तमान भारत की न्याय व्यवस्था का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। इसका मुख्य उद्देश्य प्राचीन भारत की न्यायिक परंपराओं और आधुनिक संवैधानिक न्याय प्रणाली के बीच समानताओं एवं भिन्नताओं का विश्लेषण करना है। मौर्यकाल में न्याय व्यवस्था का आधार धर्मशास्त्र, परम्पराएँ तथा राजसत्ता थी, जहाँ राजा सर्वाेच्च न्यायाधीश के रूप में कार्य करता था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्णित दण्डनीति के अनुसार कठोर दण्ड व्यवस्था को सामाजिक नियंत्रण एवं राज्य की स्थिरता बनाए रखने का प्रमुख साधन माना गया था। इसके विपरीत, वर्तमान भारत की न्याय व्यवस्था एक लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक ढाँचे पर आधारित है, जिसमें न्यायपालिका स्वतंत्र है और संविधान सर्वाेच्च है। आधुनिक न्याय प्रणाली का मुख्य उद्देश्य केवल अपराधियों को दण्डित करना नहीं, बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा, सामाजिक न्याय की स्थापना तथा विधि के शासन को सुनिश्चित करना है। इस अध्ययन में न्यायालयों के संगठन, न्यायिक प्रक्रिया, दण्ड प्रणाली, समानता एवं अधिकार तथा अपील व्यवस्था जैसे प्रमुख आयामों का विश्लेषण किया गया है। तुलनात्मक अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि मौर्यकालीन न्याय व्यवस्था जहाँ त्वरित एवं प्रभावी थी, वहीं उसमें समानता एवं व्यक्तिगत अधिकारों का अभाव था।
